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Wednesday, December 26, 2012

प्यार के गवाह

वैसे तो मैं
हर रात ही गाने सुनकर
सोती  हूँ ,
पर जाने कल क्या हुआ ?
तेरी यादों ने
इस कदर दस्तक दी की
नींद से कोसो दूर मैं
बस हर गाने की
किरदार को निभाने लगी,
और उनमे
तेरी कमी महसूस
करने लगी ,
इतनी ज्यादा की
वो कमी आँखों से
बहने लगी ,
न जाने क्यों ?
पर कल तेरी यादों ने
खूब रुलाया ,
पर ये आंसू
बहुत सुकून भी  दे
रहे थे ,
क्युकी ये हमारे
प्यार के गवाह
जो थे /


रेवा 

Tuesday, December 18, 2012

क्या यही वो आजाद धरती है ?

आज अख़बार मे
फिर एक खबर छपी
फिर इनसानियत शर्मसार हुई ,
फिर हंगामा हुआ
देश भर मे ,
फेसबुक की हैडलाइन बनी
लोगो ने खूब बुरा भला कहा ,
पर वही
होगा कुछ नहीं ,
न ठोस क़ानून बनेगा
न कोई एक्शन होगा ,
कुछ दिन बाद
ये फिर
कल की बात हो जाएगी ,
हम भी
जिसमे मैं भी शामिल हूँ
लिख कर अपना गुस्सा
जाहिर कर लेंगे
पर होगा क्या ?
कुछ नहीं ,
हर माँ के दिल मे एक डर
जब उसकी बेटी
घर के बहार जाएगी ,
कब तक हम ऐसे जियेंगे ,
क्या यही वो आजाद धरती है
जिसके लिए
शहीदों ने क़ुरबानी दी थी ?


रेवा





Saturday, December 15, 2012

आज का प्यार

"प्यार" सच या सपना
कहीं मिलता है कोई अपना ?
या ये बस एक छलावा है
उलझे रहने का एक सहारा है ,
बिना "मतलब " प्यार का भी
अस्तित्व नहीं शायद ,
दुनिया मे लोग
जितना खुद को प्यार करते हैं
उसका लेश मात्र भी
दूसरों से नहीं करते ,
बस अपने मतलब को
प्यार का चोला पहना
देते हैं और
बड़ी बड़ी बातें भर करतें हैं,
क्युकी प्यार का सच्चा
एहसास तो उन्हें छु
कर भी नहीं गया है ,
अगर ऐसा होता तो
तो आज जितनी अराजकता
फैली है वो नहीं होती ,
न ही किसी के "न "
कहने पर उसे मार दिया जाता
या तेजाब से चेहरा ख़राब कर दिया जाता ,
क्युकी प्यार तो बस प्यार करना
जानता है न ,
अफ़सोस हम अपने बच्चों को
प्रकृति के साथ-साथ
प्यार का भी तोहफा
नहीं दे पायेंगे /

रेवा



Wednesday, December 12, 2012

स्त्री

स्त्री
बोलने को शक्ति स्वरुप
घर की धुरी ,घर की लक्ष्मी , 
जिसके बिना घर, घर नहीं होता 
जो अपने से पहले 
घर वालों का ध्यान रखती है ,
चाहे खाना हो या कपड़े 
पहले उनकी जरूरते 
पूरी करती है ,
फिर खुद के बारे मे 
सोचती है ,
पति का तो खास 
ध्यान रखती है ,
अपनी हर एक दुआ मे 
उसे शामिल करती है ,
पर कितने पति होंगे 
जो भगवान से 
अपनी बीवी की लम्बी उम्र 
की कामना करते होंगे ?
अगर पति प्यार न भी करे 
तो भी उसे लगता है 
की शायद परेशान हैं 
कोई बात नहीं ,
बीमारी मे भी ध्यान 
न रखे तो भी 
वो कभी शिकायत नहीं करती ,
उसे लगता है उससे भी जरूरी 
उनके पास काम है ,
हर कठिनाई मे 
सोचा जाता है की 
वो खुद ही संभाल लेगी समझदार है  ,
पर इन्सान है वो भी 
कभी कुछ भूल से 
भी गलत हो गया तो  
बोला जाता है की उसमे 
बुद्धि की कमी है ,
कितनी दोहरी 
मानसिकता लिए जीते हैं लोग 
शायद सब घरों मे नहीं 
पर अभी भी 
बहुत घरों की कहानी है ये 
पर कब तक ?


रेवा 



Tuesday, December 11, 2012

लाखों मे एक

कहने को तो
हर दोस्त
अपना होता है ,
पर सच्चा दोस्त
एक सपना होता है ,
मिलने को
ज़िन्दगी मे
मिल जाते हैं
कई लोग ,
पर जिससे दिल मिल जाए
वो लाखों मे
एक ही होता है /

रेवा

Friday, December 7, 2012

क्या यही वो ज़िन्दगी है

रोज़ की और और की दौड़ मे
खुशियों के वो छोटे छोटे पल
कहीं दब कर रह गयें हैं ,
और सबसे बड़ी बात
ये हमें पता भी नहीं चलता की
हम कब एक robot वाली
ज़िन्दगी जीने लगे हैं ,
न हमारे पास जीवन साथी
की बातें सुनने का समय होता हैं
न बच्चो की शरारतों मे खुश होने का ,
बस जीए चले जा रहे हैं
क्या यही वो ज़िन्दगी है
जिसकी हम कामना करते हैं ,
नीरस ,बेमायने
क्या हम वक़्त निकाल कर सोच पायेंगे ????????

रेवा 

Sunday, December 2, 2012

तुम ऐसे क्यों हो ?

तुम ऐसे क्यों हो ?
मुझे जिस रिश्ते की जरूरत होती है
तुम वैसे ही कैसे बन जाते हो ?
कभी दोस्त कभी हमसफ़र
कभी प्रेमी ,कभी बचपन का साथी
कैसे निभा लेते हो इतने सारे किरदार ?
क्यों सुन और समझ लेते हो मेरी हर बात
कितना झगड़ती हूँ ,कभी बेमतलब गुस्सा
हो जाती हूँ ,
पर तुम्हारे माथे पर एक शिकन तक नहीं आती
हमेशा मेरी बातें सुन कर हँसते रहते हो ,
कभी सोचती हूँ क्या रिश्ता है मेरा तुम्हारा ?
किस नाम से पुकारू तुम्हे ?
पर नहीं ,शायद हमारे रिश्ते को नाम
देना बेमानी , बेमतलब है ,
ये ऐसा अटूट रिश्ता है
जो किसी नाम ,किसी बंधन
का मोहताज नहीं
ये निर्मल जल जैसा है ,
जो बस बहता रहता है
हमारे एहसासों की नाव लिए ,
और कहता है
"नाव कागज़ की सही
पर डूबेगी नहीं "/



रेवा


Saturday, November 24, 2012

मेरा अस्तित्व

ख्यालों मे इतने उफान आ रहे हैं
पर लगता है शब्दों का समुद्र
सूख  गया है ,
बस चारो और धुंध  ही धुंध है
कुछ साफ नहीं दिख रहा ,
ज़िन्दगी मे आये इस पड़ाव
को पार करना बहुत मुश्किल
हो रहा है ,
लोग तो रूठ कर चले गए
पर अब मेरी कविता
भी मुझसे रूठी बैठी है ,
उसे कैसे बताऊ की
उसके बिना मेरा अस्तित्व
दाँव पर लगा है /


रेवा







Monday, November 12, 2012

मन का अँधेरा

हर तरफ दिवाली की धूम मची हुई है
दीये की रौशनी अँधेरी रात को
रोशन कर रही है ,
पर मन मे इतना गहरा
अँधेरा और सन्नाटा
छाया है की ,
दिवाली की रौशनी भी
उसे रोशन नहीं कर पा रही .............

मैंने अपनी सासु माँ को 29th oct  को खो दिया

रेवा





Saturday, October 27, 2012

एहसासों का बांध

हमेशा तुमसे मिलने की
ख्वाइश रहती है ,
पर इस ख्वाइश को लेकर
आज दिल मे
एक कशमकश सी है ,
तुमसे मिली तो शायद
अब खुद को भावनाओं
मे बहने से रोक पाना
मुश्किल होगा ,
वो सारे अधूरे एहसास
जो बस तुम्हारी बातों से
और तुम्हे महसुस करने
से पुरे हो जाते है
कहीं बेकाबू न हो जाये ,
तुम्हे देख कर
एहसासों का बांध
कहीं टूट न जाये ,
पर फिर भी मिलना
तो है तुमसे ,
क्युकी नदी समुद्र से न मिले
तो कहाँ जाये...................


रेवा

Saturday, October 20, 2012

महिसासुरों का नाश कर सके 11

हमारी नन्ही कलियाँ 
आज के ज़माने मे 
कितनी सुरक्षित 
ये तो सभी जानते हैं ,
आये दिन हम पढ़ते 
और सुनते रहते ......
हर बार जब मैं एक नन्ही 
बच्ची को देखती हूँ 
तो दिल डरता है की 
कहीं उसके साथ कुछ 
गलत न हो जाये ....... 
हर किसी के 
मन मे इतना डर 
इतना ख़ौफ़ भर गया है 
इस बात का ....... 
पर क्या हम अपनी
बेटियों को इतना 
मजबूत ,इतने इरादे 
के पक्के नहीं बना सकते 
की वो भी माँ दुर्गा 
की तरह इन महिसासुरों 
का नाश कर सके। 

रेवा 

Saturday, October 13, 2012

कविता का सफ़र

रोज़ मन में कई ख्याल उठते हैं

कुछ शब्दों के मोती बन कर

कविता का रूप ले लेते हैं ,

और कुछ बुलबुले बन कर गायब हो जातें हैं ,

पर सुना है भाप भी कभी ख़त्म नही होते ,

कभी न कभी वो फिर मन के द्वार 


पर दुबारा दस्तक दे ही देते हैं 


और फिर जन्म लेती है 


एक अद्धभुत रचना  ........



रेवा 





Tuesday, October 9, 2012

एहसासों को कहाँ ले जाऊं

जब कभी आँखें बरसी तो
तकिये ने सहारा दिया ,

जब किसी से बात करने की इच्छा हुई तो
गानों से दिल बहलाया ,

जब किसी के साथ की जरूरत पड़ी तो
इन कविताओं ने साथ निभाया ,

जब कभी कुछ कर गुजरने की चाहत हुई तो
ख्वाबों ने वो चाहत पुरी की ,

पर अपने प्यार भरे एहसासों को कहाँ ले जाऊं
क्या बेजान वस्तुओं मे इतनी जान है की
ये मेरे एहसासों को महसूस कर सके ???


रेवा


Friday, October 5, 2012

रचनाकार की मनोदशा

जब शब्द न मिले 
एहसास कहीं खो जाये 
हर चीज़ धुँधली हो जाये 
हर ओर निराशा नज़र आये ,
दिल कुछ और बोले 
दिमाग कुछ और राह दिखाए ,
तो रचनाकार रचना कैसे करे ?
और अगर रचना न करे 
तो जीये कैसे ? 
रचनाकार की तो ज़िन्दगी ही होती है न 
उसकी रचना ..........

रेवा 


Tuesday, October 2, 2012

मन की गांठ

कल पुरानी डाईरी के
कुछ पन्ने पलटे तो
मन अवसाद से भर गया
ऑंखें भीग गयी  ,
पुराने ज़ख़्म हरे हो गए
परस्थितियाँ बदली तो नहीं ,
पर शायद हम समय
और अनुभव के साथ
उन्हें संभालना सीख जातें हैं ,
पर मन मे कहीं न कहीं
उन सब की वजह से
एक गांठ जरुर बंध जाती है
जिसे हम लाख कोशिशों
के बाद भी नहीं खोल पाते ,
कुछ लोग ,
उनके द्वारा कही गयी
मन को चुभती कुछ बातें
हम नहीं भूल पाते ,
काश! हमारे पास भी
कोई डिलीट बटन होता /


रेवा


Wednesday, September 26, 2012

प्यार की जीत

दिल और दिमाग में 
एक अजीब सी जंग 
चलती रहती है ,
दिमाग जो तुम्हे 
हमेशा गलत ठहराने 
की कोशिश करता रहता है ,
तुम्हारे प्यार और परवाह 
को मतलब से जोड़ता रहता है ,
पर ये दिल तुम्हे
हर इलज़ाम से बरी कर देता है ,
गर तुम्हारी कोई गलती भी हो 
तो उसे सही कर देता है ,
जंग चाहे कितनी भी हो 
कितनी ही दलीलें 
कितने भी अपवाद हों 
जीत तो आखिर 
हमारे प्यार की ही होनी हैं ..........


रेवा 



Friday, September 21, 2012

कहाँ से ?(माँ की पीड़ा)

रोज़ की तरह
कल फिर फ़ोन आया माँ का 
पर कल कुछ बात करने के बाद 
रो पड़ी ,
50 सालों का साथ था 
माँ और पापा का 
चले गए पापा  ,
उन्हें अकेला तन्हा छोड़ कर 
कहतीं है ,
"तुम सब ठीक बोलते हो 
मन को शांत तो रखना ही होगा 
पर कैसे भूल जाऊं उन्हें ,
हर तीज त्यौहार पर 
दिल रो उठता है मेरा ,
कुछ उनके पसंद की चीज़ 
खाने बैठूं , तो खाया नहीं जाता 
हर बात में उनकी याद आती है 
क्या करू उन यादों का ,
कहाँ से लाऊं इतनी शक्ति 
कैसे भूल जाऊं सबकुछ ,
इतने सालों में हर कुछ 
बाँटा है उनके साथ ,
लड़ाई झगड़े , हँसी ख़ुशी हर कुछ ,
अब इतना खाली सा हो गया है अचानक "
माँ की पीड़ा का ,
इन बातों का क्या जवाब दूँ 
कहाँ से लाऊं वो शब्द वो साथ 
जो माँ को तस्सली दे सके 
कहाँ से ?                    

रेवा   

Sunday, September 16, 2012

माँ मुझे मत भेज

भगवान ने ये रीत क्यों बनायीं 
बेटियाँ क्यूँ होती हैं पराई ,
बाबुल के आंगन को कर के सुना 
क्यूँ बन जाती हैं किसी और के घर का गहना ,
खुद तो बन  दुल्हन 
आ गयी पिया के देस ,
पर जब बिटिया को 
भेजने की बारी आयेगी परदेस 
तो कैसे सहूंगी यह ठेस ,
किसकी जिद्द पूरी करुँगी 
किसे दूंगी उपदेश ?
कैसे समझाऊँगी उसे 
जब वो कहेगी 
"माँ मुझे मत भेज "!


रेवा 




Thursday, September 13, 2012

किसे दोष दें

आजकल रिश्तों के मायने इतने क्यों बदल गए हैं ?
जिन भाई बहनों के साथ हम पल कर बड़े हुए ,
जिनके साथ बचपन में हर कुछ बाँट कर खाया ,हर दुःख सुख मे साथ रहे ,
उनमें बड़े हो कर तो और समझदारी आ जानी  चाहिए ,
पर शादी के बाद ,अपनी - अपनी जिम्मेदारी मे इतने व्यस्त हो 
जाते हैं की , अपने माँ बाप , भाई बहनों के लिए ही समय नहीं होता ,
कभी मीटिंग्स के बहाने, कभी पैसे की प्रॉब्लम बता कर 
कैसे बच निकलने की कोशिश कर सकते हैं ?
इन चीजों के लिए किसे दोष दिया जाये , आजकल के माहौल को ,
या मानसिकता ही बदल गयी है लोगों की ,
बचपन के प्यार और साथ को भूल कर 
बेगानों जैसा बर्ताव कैसे कर सकते हैं ?

रेवा 



Monday, September 10, 2012

मीठे आँसू

संभाल नहीं पा रही आज अपने दिल को ,
ये मौसम का असर है या तुम्हारे प्यार का
या दोनों का पता नहीं ?
ऐसा पहले तो नहीं होता था
पर आज क्या हो गया ?
हज़ार कोशिशों के बाद भी
मन तुम्हारे पास ही चला जाता है ,
क्युकी मन को सुकून भी शायद
तुम्हारी याद और तुम्हारे एहसास मे मिलता है ,
आँखों ने भी बरस कर खूब साथ दिया तुम्हारा
पर हाँ ये दुःख के आँसु नहीं है  ,
ये तो तुम्हारे प्यार मे पागल हो कर
बहने लगे हैं ,
आज पता चला की आंसुओं का स्वाद
मीठा भी होता है /

रेवा






Friday, September 7, 2012

बेचारा दिल

बेचारा दिल 
कभी जलता है , सुलगता है 
कभी ठंडा भी हो जाता है ,

कभी तीर आर पार हो जाता है 
कभी छु कर निकल जाता है ,

कभी बच्चा बन जाता है 
फिर एक ही पल मे जवान भी ,

कभी किसी पर आता है 
कभी किसी पर ,

कभी दिल मानता नहीं 
कभी कुछ जनता नहीं ,

कभी दिल भर आता है 
कभी तर जाता है ,

कभी प्यासा है 
तो कभी तृप्त हो जाता है ,

कभी टूट कर बिखर जाता है 
कभी जुड़ जाता है ,

अरे हाँ आजकल तो ये गार्डेन गार्डेन भी हो जाता है ,

कितने सारे नाम मिले दिल को 
करे क्या बेचारा ,"दिल तो आखिर दिल है" !

रेवा 



Saturday, September 1, 2012

Dont know why ?

My missing is at par
when I dont find you with me ,
I know you are always
there for me ,
but dont know why ?

I promised myself
I wont  cry,
when I miss you a lot
but  dont know why ?

when I want u to hold me
tight in your arms
and feel you,
I cant help crying
dont know why ?

I know in this life
I can only miss and dream about you ,
instead of all my love for you
dont know why ?

I know you are the most precious
possesion of my heart,
you have filled the emptiness of my life
still I cant be with you , hold you, love you
dont know why ?

rewa




Wednesday, August 29, 2012

मेरे कान्हा

कान्हा तेरे चरणों मे अर्पण है
ये अश्रु के फूल 
क्षमा करना मेरी सब भूल ,
पापिनी  हूँ दुखियारिणी हूँ 
पर हूँ तो  तेरी हि रचना ,
करती हूँ विनती आँखों मे भर नीर 
हरना मेरे ह्रदय की पीर 
चाहे कैसी भी हो तकदीर ,
जब भी टूटी मेरी आस 
तुने ही भरा नया विश्वास 
नव जीवन और उल्लास ,
आज फिर हूँ बहुत निराश 
डर और आशंका से भरी 
है हर  साँस ,
तेरे सिवा कोई नज़र आता नहीं 
दिल का बोझ अब सहा जाता नहीं ,
आंखें मूंदे झोली फैलाइए 
खड़ी हूँ आस लगाये ,
अब देर न कर 
तेरी बेटी तुझे बुलाये ,
या तो तू बुला ले अपने पास 
नहीं तो बना ले अपने                                     
चरणों का दास  !!

रेवा 

पहली बार भगवान की भक्ति पर लिखा है ,मन से आवाज़ आई उसे शब्द दिया है बस 
कुछ भूल हो थो अवश्य बताएं //



Friday, August 24, 2012

कलम से दोस्ती

पहले जब कभी 
थोडा समय मिलता था ,
तो बहुत अकेलापन 
और तन्हाई महसूस होती थी  ,
पर अब 
कलम से दोस्ती हो गयी है ,
ये इतना सुखद बदलाव है 
की क्या कहूँ ,
अब अकेलापन 
मुझे डसता नहीं ,
न ही 
तन्हाई सताती है ,
हर वक़्त मेरी दोस्त 
कलम 
मुझे  अपने पास बुलाती है ,
इसकी वफ़ादारी
की तो मैं कायल हो गयी हूँ ,
दिन हो या रात 
हर वक़्त हर पल  साथ ,
कैसी  भी हो बात 
या कितने भी बिगड़े हो हालात ,
नहीं छुड़ाती अपना हाँथ 
रोते और हँसते भी हैं हम 
साथ साथ ,
ऐ! मेरी दोस्त कलम 
बस यूँही निभाना 
हमारा साथ /


रेवा   

  

Monday, August 20, 2012

बरसात

इतने दिनों के
लम्बे इंतज़ार 
के बाद ,
बरसात की फुहार ने 
धरती की प्यास बुझाई ,
बारिश की बूंदों के साथ 
प्रकृति खिल उठी ,
हर ओर बस हरियाली 
ही हरियाली छा गयी  ,
ऐसा में 
मेरा मन भी 
हर बूंद के साथ 
अंगड़ाई लेने लगा ,
ऐसा लगा मानो 
इन बूंदों 
और ठंडी हवाओं के साथ 
कहीं से तुम आ गए 
और मुझे हौले से 
अपनी बाँहों मे 
भर लिया हो ,
इस ख्याल से  
मेरी सांसें रुक गयी 
और मैं उस पल को 
जीने के लिए 
ज़िन्दगी जीने लगी ..........

रेवा 


Thursday, August 9, 2012

मुझे सहने दो !

तुम कहते हो 
इतना एहसास है 
तुम्हारे अन्दर 
मेरे लिए 
तो जताती   
क्यों नहीं ,
प्यार इतना भरा है 
दिल मे तो 
कभी बताती 
क्यों नहीं ,
आंसू बहाती 
हो चुप चाप 
मेरे लिए 
तो मुझे भिगाती 
क्यों नहीं ,
क्यों सब मन 
मे  दबा 
कर रखती हो ?
क्या बताऊ    
तुम्हे की ,
ये एहसासों 
का तूफान 
तुम्हे उडा 
ले जायेगा ,
प्यार तुम्हे 
पागल कर देगा ,
आंसू तुम्हे 
डूबो देंगे ,
ये मेरे 
अन्दर रहेने दो, 
मुझे अकेले ही 
चलने दो ,
शायद अगले 
जनम मे 
तुम्हे पाऊ  ,
इस जनम 
मुझे सहने दो !

रेवा 






Saturday, August 4, 2012

साँझ की बेला

शाम का सुहाना मौसम ,
बादल साँझ की चादर ओढे 
रात्रि की तरफ बढ़ रहा था /
पक्षी अपने अपने घोसलों की ओर जा रहे थे  
हवा अपने पुरे योवन के साथ 
मदमाती हुई बह रही थी,  
ऐसे मे मैं अकेली बैठी 
इस प्रकृति के पुरे सौंदर्य के साथ भी
खुद को अकेला महसूस कर रही थी ,
पर तभी अचानक हवा के झोके की तरह 
तेरा पैगाम आया ,
उस एक प्यार भरे पैगाम को पा कर 
मेरा मन मयूर नांच उठा ,
अब ये साँझ की बेला तनहा न हो कर 
हमारे प्यार से महकने लगी /


रेवा 


Tuesday, July 24, 2012

उफ्फ ये दर्द


उफ्फ ये दर्द
जब होता है  तो ,
हर चीज़ इसके सामने छोटी हो जाती है ,
मन बदलने के लिए कुछ भी करो
हर बार दर्द अपनी जगह बना ही लेता है ,
गाने सुनो तो ,
गाने के बोल नश्तर चुभाते हैं ,
कोई प्यार से बात करे तो
ये और भी बढ़ जाता है ,
हर वो चीज़ ,
जो सुकून देनी चाहिये
वो दर्द का एहसास कराती है ,
लगता है
सारे ज़माने की तकलीफ सिमट कर
खुद की झोली में आ गयी हो ,
कहा जाता है की
दर्द जिसने अनुभव किया हो
उसे ही सुख की अनुभूति होती है ,
पर क्या सुख के लिए
इतना दर्द बर्दाश्त करना जरुरी है ?

रेवा

Sunday, July 15, 2012

हमसफ़र


इतने सालों मे 
तुने कुछ कहा नहीं मुझसे 
पर मैं वो हमेशा  सुनती  रही 
जो सुनना चाहती थी ,
हर जख्म मे मरहम 
खुद ही लगाती रही ,
बिना खवाब दिखाए 
रोज़ एक नया ख्वाब बुनती रही ,
अश्क बहाती रही 
और खुद ही पोछती रही ,
हर नए दिन के साथ 
नयी उम्मीद जगाती रही ,
साल बीतते गए 
जख्म नासूर बन गए ,
अश्क सुख गए  
उम्मीद टूट गयी 
दिल जल कर राख़  हो गया ,
हमसफ़र तो हम बन गए 
पर हम अकेले सफ़र करते रहे 


रेवा 

Monday, July 9, 2012

पगलाये नयन

किसी ने सच ही कहा है की,
बारिश के साथ रोना
कितना आसान होता है,
बूंदो का आंसुओं से मिलन
बादलों के प्यार का दर्द से मिलन,
पानी का पानी मे मिल क़र
बह जाना ,
कितना अद्दभुत है ये
पगलाये बादलों और
पगलाये नैनों का मिलन /


रेवा

Monday, July 2, 2012

कैसे ?

प्यार जितना प्यारा शब्द है
उतना ही प्यारा एहसास ,
खुशबू से भरा हर लम्हा
हर वक़्त एक अजीब सी
गुदगुदी का महसूस होना ,
ख्याल भर से ही मुस्कुराहट
बिखेर जाना ,
हर तरफ संगीत ही संगीत ,
जब कुदरत ने हमें इतना
प्यारा एहसास दिया है तो ,
हम नफरत के लिए
कैसे समय निकाल लेते हैं ?


रेवा

Tuesday, June 12, 2012

मैं तृप्त हो गयी

क्या बताऊ तुम्हे की
तुम्हारे प्यार ने
क्या - क्या दिया है मुझे ,

तुम्हारा प्यार पा कर
जैसे तृप्त हो गयी हूँ मैं ,

आंसू  अब अपना रास्ता
भूल गए हैं ,

होंठ अब बस हमेशा
मुस्कुराना सीख गए हैं ,

मन में उठती सवालो
की लहरें अब शांत हो गयी हैं ,

धडकनों को अपना पता
मिल गया है ,

जैसे मेरे एहसासों को  पनाह
मिल गयी है ,

होते होंगे प्यार मे पागल लोग
पर मैं तो तृप्त हो गयी  /



रेवा


Wednesday, May 30, 2012

काश मैं भी चाँद होती



हर रात जब मैं
अपनी बाल्कनी खोलती हूँ तो
चाँद मुस्कुराते हुए
मुझे चिड़ाता है ,
कभी हँसाता है
कभी समझाता भी है ,
कभी नज़रे चुरा कर
हौले से थपकी दे कर
सुला देता है ,
कभी मुझे अकेलापन महसूस हो तो
अपने होने का एहसास दिलाता है ,
कभी कभी तो अपनी चाँदनी
के साथ होने की वजह से बहुत इतरता है
और तब वो पूरा नज़र आता है,
अपनी चाँदनी की रौशनी
हर तरफ बिखेरता है ,
हाँ पर किसी दिन जब वो
मेरे साथ लूका छीप्पी खेलता है तो
फिर लाख ढुंढ़ो कहीं नज़र नही आता ,
काश! मैं  भी चाँद की तरह होती
बस अपनी चाँदनी के साथ
हर हाल मे खुश होती ,
और दूसरो को भी खुश रखती !

रेवा

Wednesday, May 23, 2012

वाह ! ये पैसा

आज बहुत खुश थी  मै ,
18 साल बाद अपने सबसे प्यारी 
सखी से जो मिलने वाली थी  ,
कितनी बातें करनी थी  उससे 
आह ! लग रहा था 
इतने सालों की बातें 
बस मिनीटो मे  कर डालु ,
हम एक रेस्तौरेंट मे मिले 
पर समय के साथ 
लोग बदल जाते हैं 
सुना तो था 
पर देखा आज ,
पैसे का अहं 
हर बात मे दिखावा ,
अपनी शेखी बगारना 
वो मिलने नहीं बल्कि 
दिखाने आयी थी अपनी अमीरी ,
इस पैसे ने और एक इंसान को 
अपना गुलाम बना लिया ,
दुःख तो  इस बात का है 
की वो मेरी प्यारी सहेली थी /
वाह ! ये पैसा 

रेवा 



Sunday, May 13, 2012

"मदर्स डे "

एक प्रशन मुझे बार- बार सताता है , क्या माँ के सम्मान के लिए हमे एक दिन चाहिए , जिसे हम  " मदर्स डे " कहते हैं ? क्या बाकि 364 दिन हमे उनका सम्मान नहीं करना चाहिए ? कितनी ही दुखद घटनाएं सामने आती है तब हम उनपर ध्यान ही नहीं देते / बस इस एक दिन हम उनका सम्मान करने का दम भरते हैं / आये दिन बच्चे माँ  को  घर से निकाल  कर ओल्ड एज होम भेज देते हैं ,जहाँ वो अपनी ख़ुशी से महरूम , बेगानों के साथ जीवन बिताने पर मजबूर हो जाती हैं , तब हम इस दिन को भूल जातें हैं ? जब उनके साथ दुर्व्यहार करते हैं , उन्हें एक पुराना सामान समझ कर घर के एक कोने तक सिमित रखते हैं , तब इस दिन को भूल जाते हैं ? भूल जाते हैं की कभी इसी माँ ने अपने दुःख सुख भूल कर इतना बड़ा किया , समाज मे सर उठा कर जीने लायक बनाया / हमारी मानसिकता इतनी ओछी क्यों हो गयी है ? क्या हम 365 दिन मदर्स  डे नहीं मना सकते ? उन्हें बच्चो से कुछ नहीं चाहिये , बस प्यार और सम्मान के सिवा / क्या वो भी हम उन्हें नहीं दे सकते ,क्या इस एक दिन उनका सम्मान कर के हम अपनी जिम्मेदारी को पूरा कर रहे हैं ? ये एक बड़ा प्रश्न है / 

Friday, May 4, 2012

विशवाश

आज मन बहुत घबरा रहा है 
दोस्त पर विशवाश डगमगा रहा है ,
जाने क्यों ,
विशवाश टूट न जाये
ये डर सता रहा है ,
विश्वाश की डोर थामे
सालों दोस्ती निभाई  हमने ,
फिर आज क्यों ये डोर 
कमजोर पड़ रही है ,
एक एक कर के सारे रेशे
एक दुसरे का साथ छोड रहे हैं ,
मै तुझे कटघरे मे खड़ा कर रही हूँ
और खुद ही सारे तर्क दे कर 
तुझे कटघरे से मुक्त भी कर रही हूँ !
ये  कैसी इम्तेहान की घडी है ?
मेरे सामने मेरी दोस्त खडी है ,
ऐसा दिन कभी किसी दोस्त की ज़िन्दगी 
में न आये , 
ये दुआ करती हूँ घडी घडी .........


रेवा    


Monday, April 30, 2012

मुलाकात

फिर से हो रही है 
तुझसे मिलने की आस ,
न जाने कैसा होगा 
वो एहसास  ,
क्या कुछ बोल पाऊँगी ?
या फिर से कर जायेंगी 
आँखें  अपना काम ,
ख़ामोशी बन जाएगी जुबां
जज्बात  बिन कहे सुने 
होंगे पास ,
घंटे पल मे और पल 
छण मे बीत जाएंगे ,
उस छण को जीने
के लिए चलती हैं साँस  ,
बीत जाते है
दिन और रात  ,
न जाने कब होगी वो
प्यार भरी मुलाकात /

रेवा  



Sunday, April 22, 2012

मेरी रचना को अपने नाम से कॉपी पेस्ट

http://setubaba.blogspot.com/    इस  ब्लॉग  पर  15 sep 2011 को  मेरी  पूरी  रचना 

"मेरा प्यार " जिसे मैंने 5 Nov 2009  को  अपने ब्लॉग पर पोस्ट की थी , http://rewa-mini.blogspot.in/2009/11/blog-post.html

 को कॉपी कर के अपने नाम से पेस्ट कर लिया है /  लोग ऐसा कैसे 

कर सकते हैं ?


रेवा 


Friday, April 13, 2012

क्या इस रिश्ते को नाम देना जरूरी है

कभी कभी सोचती हूँ 
क्या रिश्ता है मेरा तुम्हारा ?
दोस्ती का या प्यार का ?
दोस्ती ऐसी जैसी 
कृष्ण सुदामा की थी ,
या प्यार ऐसा जैसा 
मीरा ने कृष्ण से किया था /
या कोई और रिश्ता ?
क्या हर रिश्ते को नाम देना जरूरी है ?
इतना ही काफी नहीं की
मन मिल गए ,
जब मुझे तुम्हारी जरूरत होती है 
तो हमेशा तुम मेरे पास होते हो ,
समझते हो मुझे ,
समझाते हो मुझे ,
न कुछ गलत करने देते हो 
न होने देते हो ,
और जब तुम्हे मेरी जरूरत होती है 
तो मै तुम्हारे पास ,
जरूरत न भी हो तो 
हम एक दुसरे के साथ ,
बहुत कुछ बाँट लेते हैं ,
हंस लेते है , रो लेते हैं /
क्या इतना काफी नहीं ,
क्या इस रिश्ते को नाम देना जरूरी है ???

रेवा 


Tuesday, April 3, 2012

खुद को कहते इंसान हैं

इंसान कितने दोगले होते हैं
हर बार नवरात्र मे
देवी माँ की पूजा करते हैं
छोटी छोटी कन्याओं को
भोजन कराते हैं
आशीर्वाद लेते हैं ,
फिर उन्हें ही जन्म लेने
से पहले मार डालते हैं ,
उनके साथ बलात्कार
करते हैं ,
ताकि वो जीते जी ही
मरे के सामान हो जाये ,
इतने पर भी पेट नहीं भरता ,
दहेज़ के लिए उन्हें
प्रताड़ित कर ,
जिंदा जला देते हैं /
जानवरों जैसा सुलूक कर ,
खुद को कहते इंसान हैं /


रेवा


Thursday, March 22, 2012

वैसे रह पाए ?

चलो ,एक बार फिर 
वहीँ चलते हैं ,
समुन्दर के किनारे 
गीली रेत पर ,
जहाँ घंटो बैठ कर 
हम दोनों ने नाम लिखा था ,
आती जाती 
उन लहरों के साथ 
कितनी कसमें खायी थी ,
ठंडी हवाओं के साथ 
कितने महकते पल बिताये थे ,
वो रेत अभी भी 
वैसे ही गीली है ,
वो लहरें ,वो हवाएँ 
सब वैसे ही हैं 
पर क्या हम 
वैसे रह पाए ??????

रेवा 

Friday, March 2, 2012

यही मेरा नसीब

क्या कहूँ 
मन कैसा हो रहा है आज ,
सहनशक्ति के सारे बांध 
टूट रहे हैं  ,
नहीं सहा जाता अब 
रोज़ रोज़ आशा भरी 
नज़रों से तुम्हे 
टुकुर टुकुर देखना ,
लगता है आज तो
तुम कुछ मन की बात करोगे  ,
यही पूछ लो शायद 
की क्या "तुमने खाना खाया "
पर नहीं रोज़ की तरह 
आज भी ,
बस एक मौन पसरा है ,
वही तुम्हारा ऑफिस से आना 
खाना खा कर सो जाना ,
न एक नज़र देखना 
न ही बात करना ,
करवटों मे रात 
बीत जाती है ,
पर एक हाँथ के 
फासले पर सोये 
तुम्हे खबर भी नहीं होती ,
हर बार खून के आंसू 
पी कर रह जाती हूँ ,
लगता है कल नया दिन 
नयी शुरुआत ,
पर अब लगता है शायद 
यही मेरा नसीब है 
यही मेरी ज़िन्दगी .............


रेवा 

Thursday, February 23, 2012

वो बचपन का गुजरा जमाना

कभी कभी 
बहुत याद आता है मुझे 
वो बचपन का गुजरा जमाना  ,
वो भैया से  झगडे 
और दीदी की पुचकार ,
छोटी छोटी बातों मे
रूठना और छुप जाना ,
रो रो कर अपनी हर बात मनवाना ,
पापा का लाड बरसाना
मम्मी का झूठ बोल कर 
खाना खिलाना ,
गुप्ता जी के दूकान से 
चोरी चोरी जा कर 
१० पैसे के गटागट खाना ,
दोस्तों के साथ 
कबड्डी और कित कित खेलना ,
माँ को मना कर दोस्त के घर 
पढने जाना ,
अब तो बस आँखों मे बसे हैं     
वो दिन ,वो पलछिन ,
काश ! कोई लौटा दे
वो बचपन का गुजरा जमाना /



रेवा 


Friday, February 17, 2012

कहाँ चले गए मेरे पापा ?

ये कैसा नियम है 
भगवान का ,
कहाँ ले जाते  है 
वो इन्सान को ?
कहाँ चले गए 
मेरे पापा ?
कितना आवाज़ देती हूँ 
बुलाती हूँ उन्हें 
नहीं जवाब देते ,
पहले तो 
एक आवाज़ मे
सुन लेते थे ,
अब क्या हुआ ?
क्यों रूठ गए मुझसे ,
क्यों नहीं मुझसे पूछते
"बेटा कैसी हो ?
कुछ परेशानी तो नहीं तुम्हे" ,
क्यों नहीं शिकायत करते की ,
" तेरी माँ मुझसे बहुत लडती है ,
मीठा खाने  नहीं देती ",
  मैं किसे बोलूं "पापा "
कहाँ चले गए मेरे पापा ?


रेवा 

Tuesday, February 14, 2012

उदास हंसी

थकन सी महसूस 
हो रही है आज ,
कहीं कुछ टूट 
गया है ?
दिल की दीवारें 
चटक गयी है शायद ,
एहसासों के पंख 
चूर चूर हो गए हैं ,
मन ख़ाली हो 
गया है ,
आँखों की नमी 
रही नहीं अब ,
हंसी भी उदास 
हो गयी है ,
जैसे सब शोक
मना रहे हों 
मेरे अरमानो के 
टूट जाने का ............

रेवा 



Friday, January 27, 2012

इंसानी फितरत

जब जब अकेली होती हूँ
जी भर कर रोती हूँ ,
कैसे बताऊ मन की व्यथा ?
रोज़ टूटती हूँ 
फिर उठ खुद को जोडती हूँ ,
उन्हें सहारा और ताक़त 
देने के लिए मजबूत 
बन जाती हूँ ,
पर उनके व्यव्हार से 
फिर टूट जाती हूँ ,
भगवान ने ऐसी फितरत 
ही बनायीं है इंसान की ,
जब वो  कमज़ोर होता है 
तो उसे प्यार नज़र आता है ,
पर वही जब ठीक  होता है 
तो सब भूल जाता है ,
ये सोचे  बिना की ,
जिसने अपना 
निरछल प्यार बरसाया 
वो तब भी वहीँ था 
और अब भी वहीँ है /


रेवा 


Wednesday, January 11, 2012

क्यों रो पड़ती हूँ

कभी  कभी 
खुद पर ही 
विशवाश नहीं होता ,
जब तुम्हे प्यार भरी 
पाती लिखती हूँ 
और पढ़ती हूँ ,
तो लगता है 
क्या ये मैंने लिखा है ?
क्या इतना प्यार भरा 
होता है दिल मे ,
या सच मे मैं 
पागल हूँ ,
जैसा तुम कहते हो ,
पर सच बताऊ तो
पढ़ कर आंखें 
भर आती है ,
पता नहीं क्यों ?
लिखा तो तुम्हे है
फिर मैं क्यों 
रो पड़ती हूँ  ?

रेवा